संध्या (प्रिय प्रवास से) अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' रचित दिवस का अवसान समीप था गगन था कुछ लोहित हो चला तरु शिखा पर थी अब राजती कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा विपिन बीच विहंगम वृंद का कल निनाद विवर्धित था हुआ ध्वनिमयी विविधा विहगावली उड़ रही नभ मंडल मध्य थी अधिक और हुई नभ लालिमा दश दिशा अनुरंजित हो गयी सकल पादप पुंज हरीतिमा अरुणिमा विनिमज्जित सी हुई झलकते पुलिनो पर भी लगी गगन के तल की वह लालिमा सरित और सर के जल में पड़ी अरुणता अति ही रमणीय थी।। अचल के शिखरों पर जा चढ़ी किरण पादप शीश विहारिणी तरणि बिंब तिरोहित हो चला गगन मंडल मध्य शनै: शनै:।। ध्वनिमयी करके गिरि कंदरा कलित कानन केलि निकुंज को मुरलि एक बजी इस काल ही तरणिजा तट राजित कुंज में।।
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से: बाबू रघुबीर नारायण का अमर लोक गीत सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से मोरा प्रान बसे हिमखोह रे बटोहिया. एक द्वार घेरे रामा, हिम कोतवालवा से तीन द्वारे सिंधु घहरावे रे बटोहिया. जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिंद देखी आऊं जहवां कुहंकी कोइली गावे रे बटोहिया. पवन सुगंध मंद अमर गगनवां से कामिनी बिरह राग गावे रे बटोहिया. बिपिन अगम धन, सघन बगन बीच चम्पक कुसुम रंग देवे रे बटोहिया. द्रुम बट पीपल, कदम्ब नीम आम वृक्ष केतकी गुलाब फूल फूले रे बटोहिया. तोता तूती बोले रामा, बोले भंेगरजवा से पपिहा के पी-पी जिया साले रे बटोहिया. सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से मोरे प्रान बसे गंगाधार रे बटोहिया. गंगा रे जमुनवां के झगमग पनियां से सरजू झमकि लहरावे रे बटोहिया. ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसि दिन सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया. उपर अनेक नदी उमड़ी-घुमड़ी नाचे जुगन के जदुआ जगावे रे बटोटिया. आगरा-प्रयाग-काशी, दिल्ली कलकतवा से मोरे प्रान बसे सरजू तीर रे बटोहिया. जाऊ-जाऊ भैया रे बटोही हिंद देखी आऊ जहां ऋषि चारो वेद गावे रे बटोहिया. सीता के बिमल जस, राम ...